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Saturday, 7 December 2019

भारत में कम्प्यूटर की तीसरी जेनरेशन की उत्पत्ति


भारत में तीसरी जनरेशन का विकास सन (1964 -1975 ) के बीच में हुआ था। इसका आविष्कार जेक सेंट क्लेयर एवं रॉबर्ट नायस ने सन 1958 में पहले इंटीग्रेटेड सर्किट्स का आविष्कार किया था। इसमें इंटीग्रेटेड सर्किट्स होते थे जो सिलिकॉन की एक चिप पर कम्पोनेंट्स के बीच की अतः संबध्दता से तारो को हटा कर ट्रांज़िस्टर्स ,रेजिस्टर्स  और केपीसिटर्स जैसे अनेक छोटे छोटे इलेक्ट्रॉनिक्स कम्पोनेंट्स से मिलकर बने हुए होते थे। इंटीग्रेटेड सर्किट्स की तकनीक को माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स के नाम से भी जाना जाता था। क्योंकि इसमें बहुत बड़ी संख्या में सर्किट्स कम्पोनेंट्स को सिलिकॉन की बहुत छोटी परत जिसमे 5 मिमी वर्ग से कम होता था जिसे "चिप" कहा जाता था। शुरू में जब कम्प्यूटर की जनरेशन में दस से बीस इंटीग्रेटेड सर्किट्स  के कंपोनेंट्स होते थे। 
तीसरी जनरेशन को स्माल स्केल इंटीग्रेशन के नाम से भी जाना जाता था। पहले इनमे स्माल स्केल इंटीग्रेशन  का प्रयोग होता था इसके बाद में मीडियम स्केल इंटीग्रेशन का प्रयोग किया जाने लगा। इंटिग्रेटेड सर्किट्स हाथ से इलेक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट्स को तारो द्वारा जोड़कर बनाये गए सर्किट्स की अपेक्षा अधिक छोटे ,कम खर्चे वाले पार्ट्स, अधिक विश्वसनीय ,और इसके संचालन में तेज ,और कम ऊष्मा उतपन्न करने वाले तथा कम बिजली की खपत करने वाले होते थे।
इसके साथ ही स्टोरेज तकनीक के सुधार की वजह से बड़ी मेग्नेटिक कोर आधारित रेण्डम एक्सेस मेमोरी साथ ही बहुत क्षमता की मैग्नेटिक डिस्क और टेप्स का निर्माण होने लगा। और तीसरी जनरेशन में कम्प्यूटर्स की कुछ मेगा बाइटस से मुख्या मेमोरी  और प्रति डिस्क ड्राइव डेटा की कुछ मेगा बाइटस की दस गुणा स्टोरेज क्षमता होती है।
अगर देखा जाए तो सॉफ्टवेयर में मामले में तीसरी जनरेशन के दौरान उच्च-स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाओं, टाइमशेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम , हार्डवेयर से सॉफ्टवेयर की स्वतंत्रता और कुछ फ्री सॉफ्टवेयर उद्योग की रचना का मानकीकरण किया गया था।
उस टाइम पर FORTRAN तथा COBOL बहुत अधिक लोकप्रिय उच्च स्तरीय भाषाए होती थी। बाद में इन्हे अमेरिकन नेशनल स्टैण्डर्ड इंस्टिट्यूट ने इन्हे ANSI FORTRAN और ANSI कोबोल कहे जाने लगा।
सन 1965 तक कम्प्यूटर निर्माण कर्ताओ ने हार्डवेयर के साथ सम्बद्ध सॉफ्टवेयर फ्री में बेचने लगे। इससे बहुत खरीददार को ख़रीदे गए कम्प्यूटर के साथ सभी भाषाओं को सपोर्ट करने वाला भाषा अनुवादक निशुल्क प्राप्त हुआ था। बाद में सन 1969 में स्थिति बदल गयी जिससे जब IBM और अन्य कम्प्यूटर निर्माताओं व् अन्य हार्डवेयर के साथ साथ फिर अलग अलग सॉफ्टवेयर की कुछ कीमत भी लेने लग गए।

और दूसरी जनरेशन काल में मिनी कम्प्यूटर्स का विकास हुआ था। सन 1960 के पहले तक निर्मित कम्प्यूटर्स मेनफ्रेम सिस्टम के थे जिन्हे प्रयोग में लाने के लिए केबल बहुत बड़ी कंपनियों द्वारा ही ख़रीदा गया था।
सन 1965 में डिजिटल इक्विमेन्ट कारपोरेशन ने अपना पहले वाणिज्यक मिनी कम्प्यूटर बाजार में उतारा था।  जिसका नाम PDP-8 रखा गया था। इसे आसानी  से एक कमरे से दूसरे कमरे में रखा जा सकता था। और इसे ऑपरेट करने के लिए किसी कम्प्यूटर ऑपरेटर की जरुरत भी नहीं पड़ती थी। इसमें टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम प्रयुक्त किया गया था। और एक ही स्थान पर रहने वाले विभिन्न प्रकार के प्रयोक्ताओं द्वारा इसे क्रम बार एक्सेस किया जा सकता था। पहले से कम्प्यूटर बने उनकी अपेक्षा में इसकी कीमत और और चौड़ाई एक चोथाई रह गयी थी। इस बजह से व्यापार एवं वेज्ञानिक ऍप्लिकेशन्स के लिए छोटे कम्प्यूटर की मांग भी छोटी कंपनियों के बढ़ने लगी। फिर 1971 में मिनिकम्प्यूटर बनाने वाली कई कम्पनिया बाजार में आ गयी।

तीसरी जेनरेशन के कम्प्यूटर्स की प्रमुख विशेषताए क्या क्या थी :
1. ये कम्प्यूटर्स द्वितीय जेनरेशन कम्प्यूटर्स की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली विशेषताए वाले होते थे।  ये लगभग 1 मिलियन निर्देश प्रति सेकंड पर कार्य करने में सक्षम होते थे।  
2.  तीसरी जेनरेशन वाले कम्प्यूटर द्वितीय  जेनरेशन वाले कम्प्यूटर की अपेक्षा बहुत छोटे थे। इसके लिए बहुत काम जगह की जरूरत पड़ती थी।
3. तीसरी जेनरेशन वाले कम्प्यूटर द्वितीय  जेनरेशन वाले कम्प्यूटर की अपेक्षा बिजली की जरुरत होती थी।
4. तीसरी जेनरेशन वाले कम्प्यूटर द्वितीय  जेनरेशन वाले कम्प्यूटर गति में भी तेज होता था। और आसानी से जरुरत के अनुसार काम में ले सकते थे।




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